अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति

भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 6

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संस्कृत श्लोक

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

हिंदी अर्थ

हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि मनुष्य के जीवन में उसके अंत समय का भाव या विचार अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। जिस भी भावना या विचार में व्यक्ति जीवन भर लीन रहता है, उसी विचार का प्रभाव उसके अंतिम क्षणों में भी रहता है। और इसी के आधार पर वह व्यक्ति अगले जन्म में उसी भाव को प्राप्त करता है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन भर भगवान का स्मरण करता रहता है, तो अंत समय में भी उसका मन भगवान में ही लगा रहेगा, और वह भगवान को प्राप्त करेगा। वहीं, यदि कोई व्यक्ति भौतिक इच्छाओं में लिप्त रहता है, तो अंत समय में भी उसका मन उन्हीं इच्छाओं में रहेगा और वह उन्हीं भौतिक वस्तुओं की ओर आकर्षित होगा।

श्रीकृष्ण का यह उपदेश हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि हमें अपने जीवन का उद्देश्य और अपने विचारों को इस प्रकार से ढालना चाहिए कि अंत समय में हमारा मन भगवान में ही लगा रहे। इस प्रकार, हम भगवान को प्राप्त कर सकते हैं और इस संसार के बंधनों से मुक्त हो सकते हैं।