अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति
भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥
हिंदी अर्थ
हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं। अर्जुन यह जानना चाहते हैं कि 'अधियज्ञ' किसे कहा जाता है और यह शरीर में कौन है। साथ ही, अर्जुन यह भी जानना चाहते हैं कि मृत्यु के समय साधक, जिन्हें 'नियतात्मा' कहा गया है (जो अपनी इंद्रियों और मन को वश में रख चुके हैं), वे भगवान को कैसे जान पाते हैं।
गूढ़ अर्थ:
अधियज्ञ कौन है? - 'अधियज्ञ' का अर्थ उस परमात्मा से है, जो यज्ञों के माध्यम से पूजनीय और अधिष्ठाता होता है। यहाँ अर्जुन का प्रश्न है कि इस शरीर में वह अधियज्ञ कौन है, जिससे यज्ञ के क्रिया-कर्म संपन्न होते हैं।
मृत्यु के समय भगवान को जानने का उपाय - मृत्यु के समय, जब मनुष्य अपने शरीर को छोड़ने की प्रक्रिया में होता है, तब भगवान को जानने और उन्हें प्राप्त करने का तरीका क्या है? इस समय आत्मा की स्थिरता और भगवान के प्रति अडिग श्रद्धा की आवश्यकता होती है।
भगवान श्रीकृष्ण इस प्रश्न का उत्तर अगले श्लोकों में विस्तार से देंगे, जिससे यह समझ में आएगा कि जीवन के अंतिम क्षणों में भगवान का ध्यान कैसे किया जाए और 'अधियज्ञ' की अवधारणा को कैसे समझा जाए।