अध्याय 7: भगवद्ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 7, श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
हिंदी अर्थ
बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य ज्ञान की महिमा को वर्णित कर रहे हैं। यहाँ भगवान कह रहे हैं कि बहुत सारे जन्मों और कई जीवन की साधना के बाद, जब व्यक्ति वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है, तब वह मेरे (भगवान श्रीकृष्ण के) शरण में आता है। ऐसे व्यक्ति को "ज्ञानवान" कहा जाता है, अर्थात् वह व्यक्ति सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर चुका है और अब उसने मुझे, वासुदेव को, सर्वसमर्थ और सर्वव्यापी मान लिया है।
व्याख्या:
"बहूनां जन्मनामन्ते": यह दर्शाता है कि कई जन्मों की यात्रा और कर्मकांडों के बाद ही व्यक्ति को सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह ज्ञान केवल साधना, तपस्या और अनुभवी जीवन के बाद ही संभव होता है।
"ज्ञानवान्मां प्रपद्यते": जब व्यक्ति इस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, तब वह मेरे प्रति समर्पित हो जाता है। ज्ञानवान यहाँ पर उस व्यक्ति को कहा जा रहा है, जिसने सत्य को समझ लिया है और जो अब मेरे प्रति पूर्ण समर्पण में है।
"वासुदेवः सर्वमिति": यहाँ पर व्यक्ति यह जानता है कि वासुदेव (भगवान श्रीकृष्ण) ही सब कुछ हैं। वे ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवताओं के रूप में प्रकट होते हैं और इस प्रकार सब कुछ उन्हीं का अंश है।
"स महात्मा सुदुर्लभः": ऐसा महात्मा, जो इस ज्ञान को प्राप्त करता है और सच्चे अर्थ में भगवान को समझता है, वह अत्यंत दुर्लभ होता है। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली होता है और उसका आना या मिलना कठिन है।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के बाद ही व्यक्ति आध्यात्मिक सच्चाई को समझता है और इस ज्ञान के साथ वह भगवान श्रीकृष्ण की पूर्णता और सार्वभौमिकता को स्वीकार करता है। ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करना बहुत ही कठिन है, और यही सत्य मार्ग है।