अध्याय 7: भगवद्ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 7, श्लोक 12

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संस्कृत श्लोक

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये।

मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥

हिंदी अर्थ

और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में (गीता अ. 9 श्लोक 4-5 में देखना चाहिए) उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं

सरल हिंदी व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह समझाते हैं कि:

सात्त्विक भावनाएँ: ये शुद्धता, ज्ञान, और तपस्या से संबंधित होती हैं। ये गुण मानव को शांति और संतुलन की ओर ले जाते हैं।

राजसिक प्रवृत्तियाँ: ये अति-क्रियात्मकता, इच्छाओं और ऐश्वर्य की ओर प्रवृत्त होती हैं। ये मनुष्य को चिंताओं और संघर्षों में फंसाए रखती हैं।

तामसिक स्वभाव: ये अज्ञानता, आलस्य और विघ्न की प्रवृत्तियाँ होती हैं। ये मनुष्य को ढीला और निष्क्रिय बना देती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से बताते हैं कि ये गुण ब्रह्मा के अंश हैं और सब कुछ उनके माध्यम से ही कार्यान्वित होता है। कोई भी गुण या प्रवृत्ति वास्तव में भगवान से ही संबंधित है और इनका अस्तित्व भगवान के अंदर ही निहित है।

इस प्रकार, इस श्लोक से यह शिक्षा मिलती है कि सभी गुण और प्रवृत्तियाँ भगवान की व्यवस्था का हिस्सा हैं और हमें इनसे जुड़ने के बजाय, इनके पार जाकर ईश्वर की ओर बढ़ना चाहिए।