अध्याय 6: ध्यानयोग

भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 31

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संस्कृत श्लोक

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥

हिंदी अर्थ

जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यानयोग के योगी की विशेषता का वर्णन किया है। श्लोक में भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति सर्वभूत स्थित, यानी सभी प्राणियों में समाहित मेरे स्वरूप को भजता है और एकत्व की स्थिति में रहता है, वह हर स्थिति में योगी होता है और मुझमें स्थित रहता है।

1. "सर्वभूतस्थितं यो मां" – इसका तात्पर्य है कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों में, अर्थात् संपूर्ण सृष्टि में, मेरे दिव्य स्वरूप को देखता है और समझता है, वह एक सच्चा भक्त है।

2. "भजत्येकत्वमास्थितः" – इसका मतलब है कि जो व्यक्ति इस सच्चाई को समझते हुए एकत्व की स्थिति में रहता है, अर्थात् वह भिन्नता और विभाजन को पार करके एकता की अनुभूति करता है, वह सच्चे योगी की पहचान करता है।

3. "सर्वथा वर्तमानोऽपि" – इसका तात्पर्य है कि चाहे वह किसी भी स्थिति में या कहीं भी हो, उसका योग और भक्ति एक समान रहती है।

4. "स योगी मयि वर्तते" – अंत में, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा योगी, जो हर स्थिति में मेरे साथ स्थित रहता है और समर्पण की भावना से भरा रहता है, वास्तव में मुझमें ही रहता है।

इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि सच्चे योगी की पहचान इस बात से होती है कि वह हर स्थिति में और हर प्राणी में भगवान के दिव्य स्वरूप को देखता है और उसी एकत्व की स्थिति में रहता है। यह श्लोक ध्यान और भक्ति के माध्यम से एकता की भावना को प्रकट करता है और योगी की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करता है।