अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
हिंदी अर्थ
सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ध्यानयोग की गहराइयों को स्पष्ट करते हैं। यहाँ पर 'योगयुक्तात्मा' से तात्पर्य है वह व्यक्ति जो योग की साधना में पूर्ण रूप से समर्पित और अनुभवशील होता है।
इस श्लोक में दो मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है:
सर्वभूतस्थमात्मनं: इसका अर्थ है 'आत्मा जो सभी प्राणियों के भीतर विद्यमान है'। यह एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो दर्शाती है कि हर जीव में एक ही परमात्मा की उपस्थिति है, और इस आत्मा का अस्तित्व सब जगह समान है।
सर्वभूतानि चात्मनि: इसका तात्पर्य है 'सभी प्राणियों में आत्मा का दर्शन करना'। जब एक व्यक्ति ध्यान और योग की साधना में पूर्ण होता है, तो वह सभी जीवों में एक ही परमात्मा का दर्शन करता है और उसे सभी प्राणियों में समानता का अनुभव होता है।
समदर्शनः का अर्थ है समान दृष्टिकोण या समान नजरिया। जब कोई योगी आत्मा की इस सार्वभौमिक उपस्थिति को पहचान लेता है, तो उसे सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टिकोण प्राप्त होता है। वह किसी भी प्राणी को अलग नहीं मानता, बल्कि सभी में एक ही दिव्य तत्व का अनुभव करता है।
सारांश में, इस श्लोक में ध्यानयोगी के उस दिव्य अनुभव की बात की गई है जब वह सभी प्राणियों में समान आत्मा की उपस्थिति को पहचानता है और उसे सभी में एकता का अनुभव होता है। यह स्थिति एक आदर्श योगी की होती है, जो हर जीव और वस्तु में समानता और दिव्यता को देखता है।