अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
हिंदी अर्थ
दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ध्यानयोग के अभ्यास की सही विधि पर प्रकाश डालते हैं।
युक्ताहारविहारस्य: इसका अर्थ है, सही और संतुलित आहार और विहार (आवास, व्यायाम) का पालन करने वाले व्यक्ति के लिए। योगी को अपने आहार और जीवनशैली में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
युक्तचेष्टस्य कर्मसु: इसका मतलब है, उचित और संतुलित प्रयास (चेष्टा) करने वाले व्यक्ति के लिए। कर्मों में संतुलन और समर्पण आवश्यक है।
युक्तस्वप्नावबोधस्य: इसका तात्पर्य है, उचित नींद और जागरण का पालन करने वाले व्यक्ति के लिए। नींद और जागरण की स्थिति में भी संतुलन बनाए रखना चाहिए।
इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए, योगी को एक संतुलित और अनुशासित जीवन जीना चाहिए। यह ध्यानयोग के अभ्यास के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने आहार, व्यायाम, कार्य और नींद में संतुलन बनाए रखे। इस प्रकार, ऐसे व्यक्ति के लिए योग, दुखों को समाप्त करने वाला होता है।
इस श्लोक में, भगवान श्री कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि योगी का ध्यान और साधना तभी सफल होती है जब वह अपने जीवन में संतुलन और अनुशासन बनाए रखे।