अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 7

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संस्कृत श्लोक

( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा )

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।

सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥

हिंदी अर्थ

जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने उस व्यक्ति की विशेषता का वर्णन किया है जो कर्मयोग में संलग्न होता है। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण बताना चाहते हैं कि:

योगयुक्तो - जो व्यक्ति योग में स्थित है, अर्थात जो अपने कर्मों को योग के सिद्धांतों के अनुसार करता है। विश्रुद्धात्मा - उसकी आत्मा पूरी तरह से शुद्ध और निष्कलंक होती है। विजितात्मा - वह व्यक्ति अपने स्वयं के आत्म को पूरी तरह से नियंत्रित कर लेता है। जितेन्द्रियः - उसकी इंद्रियाँ पूरी तरह से नियंत्रण में होती हैं। सर्वभूतात्मभूतात्मा - वह व्यक्ति सभी प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा के रूप में देखता है। कुर्वन्नपि न लिप्यते - ऐसा व्यक्ति कोई भी कर्म करने के बावजूद कर्मों के बंधनों से मुक्त रहता है, यानी कर्मों से उसकी आत्मा पर कोई असर नहीं पड़ता। सारांश:

इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि एक सच्चा योगी, जो कर्मयोग में लगे रहते हुए अपनी आत्मा को शुद्ध करता है, अपने इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है और सभी जीवों में समानता देखता है, वह किसी भी कर्म को करते हुए भी कर्मफल के बंधनों से मुक्त रहता है। उसके कर्म उसके आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं डालते, क्योंकि वह अपनी पहचान कर्मफल से नहीं जोड़ता है।