अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥
हिंदी अर्थ
मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद् अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि जो व्यक्ति सच्चे रूप में मेरे स्वरूप को समझता है, वह परम शांति प्राप्त करता है।
भोक्तारं यज्ञतपसां: यहाँ "भोक्तारं" शब्द से तात्पर्य है कि भगवान सम्पूर्ण यज्ञ और तपस्या के फल के भोगता हैं। यह दर्शाता है कि सभी यज्ञ और तप का फल भगवान को ही जाता है।
सर्वलोकमहेश्वरम्: भगवान श्रीकृष्ण सभी लोकों के स्वामी हैं। वे इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के अधिष्ठाता और रक्षक हैं।
सुहृदं सर्वभूतानां: भगवान श्रीकृष्ण सभी प्राणियों के सच्चे मित्र और हितैषी हैं। वे सभी जीवों के प्रति स्नेह और करुणा से परिपूर्ण हैं।
ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति: जो व्यक्ति इस सच्चाई को जान लेता है कि भगवान श्रीकृष्ण यज्ञ, तपस्या, और सब प्राणियों के सच्चे मित्र हैं, वह व्यक्ति शांति को प्राप्त करता है।
इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सच्चे ज्ञान और भगवान की वास्तविक स्थिति को समझने से हम आंतरिक शांति प्राप्त कर सकते हैं।