अध्याय 4: दिव्य ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 31

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संस्कृत श्लोक

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌।

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥

हिंदी अर्थ

हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि यज्ञ (अर्थात् कर्म और पूजा) के बिना इस लोक में कोई भी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। "नायं लोकः" का अर्थ है "इस लोक में ऐसा कोई भी स्थान नहीं है", और "अस्ति यज्ञस्य" का मतलब है "जहाँ यज्ञ की प्रतिष्ठा या महत्व नहीं है"।

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि यज्ञ के बिना इस संसार में कोई भी श्रेष्ठता, शांति या समृद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। यज्ञ का अर्थ केवल पूजा-पाठ या बलिदान से नहीं है, बल्कि यह कर्मों का सही तरीके से निष्पादन और धर्म के अनुसार कार्य करने की प्रक्रिया भी है।

"कुतोSन्यः" का अर्थ है "कहाँ से कोई और विकल्प", और "कुरुसत्तम" से अभिप्रेत अर्जुन के श्रेष्ठता की ओर संकेत है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह बता रहे हैं कि यज्ञ का महत्व न केवल इस जीवन में, बल्कि समग्र सृष्टि और अन्य लोकों में भी अत्यंत आवश्यक है।

इस प्रकार, यह श्लोक यज्ञ के महत्व और उसके बिना किसी भी सफलता की असंभावना को स्पष्ट करता है, और अर्जुन को इस बात का ध्यान दिलाता है कि यज्ञ और कर्म की उचितता उनके जीवन के लिए आवश्यक है।