अध्याय 4: दिव्य ज्ञान

भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 32

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संस्कृत श्लोक

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।

कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥

हिंदी अर्थ

इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने विभिन्न प्रकार के यज्ञों के बारे में बताया है। यहाँ 'यज्ञ' का तात्पर्य केवल यज्ञ के अनुष्ठान से नहीं है, बल्कि यह सभी प्रकार के कर्मों से भी है, जिनका उद्देश्य ईश्वर की उपासना और आध्यात्मिक उन्नति होता है।

श्लोक में कहा गया है कि ब्रह्मा के मुख से विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विवरण फैलाया गया है। ये यज्ञ कर्मों से संबंधित हैं, और इन्हें सही प्रकार से समझने और पालन करने से व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निर्देश दिया है कि उसे इन सभी यज्ञों के स्वरूप को जान लेना चाहिए। इन यज्ञों को समझकर और सही तरीके से पालन करके, व्यक्ति अपने जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत कर सकता है और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।

इस प्रकार, इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि यज्ञ और कर्मों के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष संभव है। जब व्यक्ति इन यज्ञों को सही तरह से समझेगा और उनका पालन करेगा, तब वह जीवन के सर्वोत्तम उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा।