अध्याय 4: दिव्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे प्रत्येक व्यक्ति को उसी प्रकार से उत्तर देते हैं जैसे वे उसे पुकारते हैं। यानी, जो कोई भी उनके पास अपनी भक्ति, श्रद्धा, या अन्य किसी भावना से आता है, भगवान उसकी उसी भावना के अनुसार उसकी मदद करते हैं और उसका मार्गदर्शन करते हैं। इस श्लोक के माध्यम से भगवान यह भी बताना चाहते हैं कि वे सबके मार्ग में सहायक हैं और सभी को उनके मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
हे पार्थ (अर्जुन), जो व्यक्ति जिस प्रकार से मुझे स्वीकार करता है और मुझसे जुड़ता है, मैं भी उसे उसी प्रकार से स्वीकार करता हूँ और उसी प्रकार से उसकी सहायता करता हूँ। इस प्रकार, सब लोग किसी न किसी रूप में मेरे मार्ग पर चलते हैं, चाहे उनकी भक्ति या आस्था किस रूप की हो।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह भी समझाते हैं कि किसी भी व्यक्ति की सच्ची भक्ति और आत्मसमर्पण से उन्हें सहायता प्राप्त होती है और हर कोई, चाहे वह किसी भी मार्ग का अनुसरण कर रहा हो, अंततः मेरे ही मार्ग पर चल रहा होता है।