अध्याय 4: दिव्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 4, श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥
हिंदी अर्थ
पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण दिव्य ज्ञान प्राप्त करने वालों के गुणों का वर्णन कर रहे हैं।
"वीतरागभयक्रोधा" का तात्पर्य है कि ऐसे लोग जिन्होंने राग (आसक्ति), भय, और क्रोध को जीत लिया है। ये व्यक्ति दुनिया की अस्थायी वस्तुओं और परिस्थितियों से निर्लिप्त होते हैं और मन की शांति प्राप्त कर लेते हैं।
"मन्मया मामुपाश्रिताः" में "मन्मया" का मतलब है कि उनका मन पूरी तरह से भगवान के ध्यान और प्रेम में रमा हुआ है। ऐसे लोग भगवान की शरण में रहते हैं और भगवान के दिव्य स्वरूप में समाहित होते हैं।
"बहवो ज्ञानतपसा पूता" का अर्थ है कि ये लोग ज्ञान और तपस्या के माध्यम से शुद्ध होते हैं। ज्ञान से तात्पर्य है दिव्य ज्ञान या वेदांत का ज्ञान, और तपस्या का अर्थ है आत्म-अनुशासन और साधना।
"मद्भावमागताः" का मतलब है कि वे भगवान के दिव्य भाव और स्वभाव को प्राप्त कर लेते हैं।
सारांश में, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने उन व्यक्तियों की प्रशंसा की है जो राग, भय, और क्रोध से परे होकर, ज्ञान और तपस्या से शुद्ध होकर, उनके प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम रखते हैं। ऐसे व्यक्ति भगवान की दिव्यता और उनके अद्वितीय स्वभाव को अनुभव कर पाते हैं।