अध्याय 3: कर्मयोग
भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥
हिंदी अर्थ
प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह समझाते हैं कि प्रकृति के गुण (सत्त्व, रजस, तमस) का प्रभाव उन लोगों पर होता है जो इन गुणों के अनुसार कार्य करते हैं। ये लोग अपने कार्यों में पूरी तरह से लगे रहते हैं और इन गुणों से भ्रमित हो जाते हैं।
यहां 'गुण' से तात्पर्य है गुणधर्म, जो हर व्यक्ति के स्वभाव और कर्मों को प्रभावित करता है। कुछ लोग गुणों के प्रभाव में आकर अपने कर्मों को सही और गलत के बीच भेद नहीं कर पाते हैं।
भगवान कृष्ण यहाँ यह सलाह दे रहे हैं कि ऐसे लोगों को जिनकी समझ पूरी नहीं है, उन्हें पूर्णता से अवगत कराना चाहिए। ये मंद बुद्धि लोग जो केवल गुणों से प्रभावित होकर कर्म करते हैं, उन्हें सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
यह श्लोक कर्मयोग की दृष्टि से यह भी संकेत करता है कि सच्चे योगी वे हैं जो इन गुणों और उनके प्रभाव को समझते हैं और अपने कर्मों को बिना प्रभावित हुए, साधना और ध्यान के माध्यम से उच्चतम ज्ञान की ओर अग्रसर होते हैं।