अध्याय 3: कर्मयोग

भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 28

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

हिंदी अर्थ

परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि जो व्यक्ति तत्त्व को जानता है, उसे यह समझना चाहिए कि गुण (प्राकृतिक गुण) और कर्म (क्रियाएँ) दोनों ही परस्पर संबंधित हैं। महाबाहो, अर्थात् हे बलशाली अर्जुन, जो व्यक्ति इस सत्य को जानता है कि गुण स्वयं अपने स्वभाव के अनुसार काम करते हैं और कर्म उसी गुण के अनुसार होते हैं, वह उन गुणों और कर्मों से प्रभावित नहीं होता।

इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति इस बात को समझता है कि गुण और कर्म स्वाभाविक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और किसी भी व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं हैं, वह उन गुणों और कर्मों में आसक्त नहीं होता।

सारांश में, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह सिखाना चाहते हैं कि जो व्यक्ति वस्तुस्थिति को समझता है और यह जानता है कि गुण और कर्म स्वाभाविक रूप से कार्यरत हैं, वह उनके प्रति अविचल रहता है और संसारिक बंधनों से मुक्त रहता है।