अध्याय 2: गीता का सार

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 41

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संस्कृत श्लोक

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।

बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि एक व्यक्ति की बुद्धि (या मन की स्थिति) को कितनी दृढ़ता और स्थिरता प्राप्त होती है, यह उसके निर्णयों और कार्यों में स्पष्टता पर निर्भर करता है।

1. व्यवसायात्मिका बुद्धि: यहाँ 'व्यवसायात्मिका बुद्धि' से तात्पर्य है एक प्रकार की समझ या बुद्धि जो निश्चल और स्थिर होती है। इस बुद्धि का उद्देश्य एक ही दिशा में केन्द्रित होना चाहिए, अर्थात् किसी एक ही कार्य या लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना।

2. एकैके ह: 'एकैके ह' का अर्थ है कि एक ही प्रकार की बुद्धि, एक ही दिशा में सोचने वाली और एक ही उद्देश्य को लक्ष्य मानने वाली।

3. बहुशाखा ह्यनन्ताश्र्च: यहां 'बहुशाखा' का मतलब है कई शाखाएँ या कई विविधताएँ। जब कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि को एक ही दिशा में केन्द्रित नहीं रखता और कई शाखाओं में बंट जाता है, तो उसकी बुद्धि में स्थिरता और स्पष्टता की कमी हो जाती है।

अर्थ: हे कुरुनन्दन (अर्जुन), जो व्यक्ति एक ही उद्देश्य के प्रति समर्पित रहता है और अपनी बुद्धि को एक ही दिशा में केन्द्रित करता है, वह स्थिर और दृढ़ बुद्धि प्राप्त करता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति अपनी बुद्धि को कई विभिन्न उद्देश्यों और विचारों में बांटता है, उसकी बुद्धि अस्थिर और चंचल रहती है।

इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह सिखाते हैं कि एक स्थिर और दृढ़ बुद्धि को प्राप्त करने के लिए एक ही लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना अत्यंत आवश्यक है, न कि विभिन्न विचारों और शाखाओं में बंटना।