अध्याय 2: गीता का सार

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 40

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संस्कृत श्लोक

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

हिंदी अर्थ

इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की अमरता और धर्म के पालन के महत्व को समझा रहे हैं।

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति: यहाँ "नेह" का तात्पर्य है "यहाँ" या "इस जीवन में"। "अभिक्रम" का अर्थ है प्रयास या कर्म। "नाशोऽस्ति" का अर्थ है कि कोई हानि नहीं होती। इस प्रकार, इस भाग में भगवान कह रहे हैं कि इस जीवन में धर्म के पालन के प्रयास की कोई हानि नहीं होती।

प्रत्यवायो न विद्यते: "प्रत्यवाय" का मतलब होता है दंड या नकारात्मक परिणाम। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण यह बता रहे हैं कि धर्म के पालन में जो भी प्रयास किया जाता है, उसका कोई भी दुष्परिणाम नहीं होता।

स्वल्पमपि अस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्: "स्वल्पमपि" का अर्थ है "थोड़ा भी"। "अस्य धर्मस्य" का अर्थ है "इस धर्म का" और "त्रायते" का मतलब है "रक्षा करता है" या "सुरक्षित करता है"। "महतो भयात्" का अर्थ है "बड़े भय या संकट से"।

इस प्रकार, इस श्लोक का सार है कि धर्म के पालन का प्रत्येक छोटा सा प्रयास भी व्यक्ति को बड़े संकट और भय से बचा सकता है।

उपसंहार:

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि धर्म के पालन में जो भी प्रयास किया जाता है, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, वह कभी भी निष्फल नहीं जाता। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति बड़े संकट और भय से सुरक्षित रहता है। धर्म का पालन हमेशा लाभकारी होता है और इसमें कभी भी किसी प्रकार की हानि या दंड नहीं होता।