अध्याय 2: गीता का सार
भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
( कर्मयोग का विषय )
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥
हिंदी अर्थ
हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सांख्य और योग के सिद्धांतों को समझाते हुए कहते हैं कि वे अपने ज्ञान को सुनें और समझें।
"एषा तेऽभिहिता सांख्ये": यहां भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि यह जो ज्ञान मैं तुम्हें बता रहा हूँ, वह सांख्य योग (ज्ञानयोग) के माध्यम से दिया गया है। 'सांख्य' का तात्पर्य है ज्ञान या तत्वज्ञान से है, जो कि वेदांत या दर्शनशास्त्र की विद्या है।
"बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु": अब भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे योग के माध्यम से प्राप्त बुद्धि की बात सुनें। योग का तात्पर्य है कर्मयोग या क्रियात्मक योग, जिसमें आत्मा की स्थिति को समझने और कार्यों का सही निष्पादन करने का ज्ञान शामिल है।
"बुद्धया युक्तो यया पार्थ": जो बुद्धि इस ज्ञान से प्राप्त होती है, वह बुद्धिमत्ता या विवेक के साथ युक्त होती है। 'पार्थ' अर्जुन को संबोधित करते हुए, भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इस बुद्धि से सुसज्जित होकर अर्जुन कर्मबंधन को पार कर सकते हैं।
"कर्मबन्धं प्रहास्यसि": इस ज्ञान और बुद्धि के माध्यम से, अर्जुन कर्मों के बंधनों को पार कर सकते हैं। कर्मबन्धन से तात्पर्य है कर्मों की वे अनिवार्यता या सीमाएँ जो हमें मोक्ष की ओर नहीं ले जातीं। इस बुद्धि से अर्जुन इन बंधनों को दूर कर सकते हैं और स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं।
संक्षेप में, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान और योग के माध्यम से सही मार्गदर्शन देने का वचन देते हैं, जिससे अर्जुन कर्मों के बंधनों से मुक्त हो सकेंगे और आत्मा की वास्तविकता को समझ पाएंगे।