अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 66

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संस्कृत श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

हिंदी अर्थ

संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना चाहिए।) में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर

सरल हिंदी व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपदेश दे रहे हैं। वे कहते हैं कि सभी धर्मों, अर्थात् सभी प्रकार के कर्तव्यों और कर्मों को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ। यह शरण एक ऐसी स्थिति है जहाँ तुम पूरी तरह से मुझे स्वीकार करोगे और केवल मेरी ही शरण में रहोगे।

श्रीकृष्ण यहाँ धर्म की व्यापकता को सीमित करते हुए बताते हैं कि सभी प्रकार के धर्म और कर्तव्य केवल उनके माध्यम से ही पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार, उन्होंने शरणागत की भावना की ओर इशारा किया है, जो कि अध्याय 18 के श्लोक 62 में स्पष्ट रूप से वर्णित है।

वे आश्वासन देते हैं कि यदि तुम पूरी तरह से उनकी शरण में आ जाते हो, तो वे तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर देंगे। इसका मतलब है कि ईश्वर की शरण में आकर, व्यक्ति सभी भौतिक और आध्यात्मिक बाधाओं से मुक्त हो जाता है। श्रीकृष्ण का यह आश्वासन शिष्य को मानसिक शांति और आत्मिक सुरक्षा प्रदान करता है।

"मा शुचः" यानी "शोक मत कर" का अर्थ है कि इस प्रक्रिया में चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान स्वयं तुम्हारे सभी पापों का प्रायश्चित करेंगे और तुम्हें मोक्ष प्रदान करेंगे। यह श्लोक संन्यास और मोक्ष की सिद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण यह सिखाते हैं कि आत्मसमर्पण और पूर्ण विश्वास से ही वास्तविक मोक्ष की प्राप्ति संभव है।