अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 67

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संस्कृत श्लोक

( श्रीगीताजी का माहात्म्य )

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥

हिंदी अर्थ

तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए

सरल हिंदी व्याख्या

तप और भक्ति का अभाव: गीता का ज्ञान केवल उन लोगों के लिए है जो तप (आध्यात्मिक अनुशासन और साधना) और भक्ति (ईश्वर के प्रति श्रद्धा और प्रेम) में विश्वास रखते हैं। यदि किसी व्यक्ति में ये गुण नहीं हैं, तो उन्हें इस ज्ञान का महत्व समझ में नहीं आएगा।

सुनने की इच्छा का महत्व: जो लोग गीता को समझने या सुनने की इच्छा नहीं रखते हैं, उन्हें यह ज्ञान देना व्यर्थ हो सकता है। इस ज्ञान का आदान-प्रदान केवल उन लोगों से किया जाना चाहिए जो इसे ग्रहण करने की तत्परता और इच्छा रखते हैं।

दोषदृष्टि रखने वालों से परहेज: जो लोग भगवान श्रीकृष्ण या उनके ज्ञान में दोष निकालते हैं या उन्हें आलोचना की दृष्टि से देखते हैं, उनके साथ गीता के ज्ञान की चर्चा नहीं करनी चाहिए। ऐसे लोग इस ज्ञान की गहराई को समझने में असमर्थ होंगे और यह केवल विवाद और संघर्ष को जन्म देगा।

इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिव्य ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एक चयनित और योग्य समूह की आवश्यकता को स्पष्ट किया है, ताकि यह ज्ञान सही मायने में उपयोगी और प्रभावशाली हो सके।