अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 57

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संस्कृत श्लोक

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥

हिंदी अर्थ

सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में जिसकी विधि कही है) तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को उपदेश दे रहे हैं कि वे सभी कर्मों को अपने मन से उनके प्रति अर्पित कर दें। इसका मतलब है कि व्यक्ति को अपने सभी कर्मों के फल को भगवान के प्रति समर्पित मानना चाहिए और किसी भी प्रकार के फल की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

"मयि सन्न्यस्य" का तात्पर्य है कि सभी कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित करते हुए, हम अपने कर्मों को भगवान की इच्छा और उनकी योजना के अनुसार ही करें।

"मत्परः" का अर्थ है कि व्यक्ति को भगवान के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण रखना चाहिए।

"बुद्धियोगमुपाश्रित्य" का मतलब है कि हमें अपने कार्यों और विचारों को सही ज्ञान और समझ के आधार पर करना चाहिए।

अंत में, "मच्चित्तः सततं भव" का तात्पर्य है कि हमें अपने मन को हमेशा भगवान में ही लगाना चाहिए और निरंतर उनके प्रति समर्पण भाव बनाए रखना चाहिए।

इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण हमें यह सिखाते हैं कि जीवन में सही दिशा और उद्देश्य को समझकर, सभी कर्मों को भगवान को अर्पित करते हुए, हम उनके प्रति पूर्ण समर्पण और निष्ठा के साथ जी सकते हैं।