अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
हिंदी अर्थ
कई एक विद्वान ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिए त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में दो भिन्न दृष्टिकोणों को प्रस्तुत किया गया है। पहले दृष्टिकोण के अनुसार, कुछ विद्वान यह मानते हैं कि हर कर्म में कुछ न कुछ दोष होता है और इस कारण उन्हें त्याग देना चाहिए। उनके अनुसार, कर्म करने से व्यक्ति अपने पथ से विचलित हो सकता है और दोषों का भागी बन सकता है।
दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार, यज्ञ, दान और तप जैसे पवित्र कर्म, जो समाज और आत्मा की उन्नति के लिए किए जाते हैं, उन्हें त्यागना उचित नहीं है। ये कर्म पवित्र होते हैं और समाज में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसलिए, इन कर्मों को त्यागने का कोई औचित्य नहीं है।
इस प्रकार, श्लोक यह बताता है कि कर्मों के त्याग को लेकर विद्वानों की विभिन्न रायें हैं और यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि कौन से कर्म त्यागने योग्य हैं और कौन से नहीं। इस श्लोक के माध्यम से हमें कर्मों के महत्व और उनके उचित त्याग की दिशा में सोचना चाहिए।