अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 2

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संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच

काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः।

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥

हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के (स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि कर्म किए जाते हैं, उनका नाम काम्यकर्म है।) त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को (ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्तव्यकर्म हैं, उन सबमें इस लोक और परलोक की सम्पूर्ण कामनाओं के त्याग का नाम सब कर्मों के फल का त्याग है) त्याग कहते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण दो प्रकार के त्याग की चर्चा कर रहे हैं। पहले प्रकार के त्याग को लेकर पण्डितजन (ज्ञानी लोग) यह मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति काम्य कर्मों (जैसे कि यज्ञ, दान, तप आदि) को त्याग देता है जो किसी विशेष फल की प्राप्ति के लिए किए जाते हैं, तो यही संन्यास होता है। इन कर्मों को करने का उद्देश्य किसी विशेष लाभ प्राप्त करना होता है, जैसे संतान प्राप्ति, धन की प्राप्ति, या किसी संकट से मुक्ति। इसलिए इन कर्मों के त्याग को संन्यास के रूप में देखा जाता है।

दूसरे प्रकार के त्याग की दृष्टि से, जो अनुभवी और विवेकशील लोग होते हैं, वे सभी कर्मों के फल का त्याग करने को संन्यास मानते हैं। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को केवल कर्म करने में ही ध्यान देना चाहिए, और उनके परिणामों की चिंता नहीं करनी चाहिए। यहां पर ‘सर्वकर्मफलत्याग’ का मतलब है कि सभी प्रकार के कर्मों के फल की आशा और इच्छा को छोड़ देना। यह दृष्टिकोण भगवान के प्रति भक्ति, देवताओं की पूजा, माता-पिता और गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान, तप, और वर्णाश्रम के अनुसार जीवन यापन के सभी कर्तव्यों में परिलक्षित होता है।

इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि त्याग केवल काम्य कर्मों के छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी कर्मों के फल की आस और उनके प्रति मोह को भी त्यागने का नाम है। यह समझने के लिए कि सच्चा संन्यास क्या है, केवल कर्मों का त्याग ही नहीं बल्कि कर्मों के परिणामों की इच्छा को भी छोड़ना आवश्यक है।