अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 17

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संस्कृत श्लोक

यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥

हिंदी अर्थ

जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बँधता है। (जैसे अग्नि, वायु और जल द्वारा प्रारब्धवश किसी प्राणी की हिंसा होती देखने में आए तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थरहित केवल संसार के हित के लिए ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी प्राणी की हिंसा होती हुई लोकदृष्टि में देखी जाए, तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तृत्वाभिमान के किया हुआ कर्म वास्तव में अकर्म ही है, इसलिए वह पुरुष 'पाप से नहीं बँधता'।)

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने संन्यास और कर्म के दर्शन के बारे में गहराई से समझाया है। इस श्लोक का मुख्य आशय यह है कि जिस व्यक्ति के मन में ‘मैं कर्ता हूँ’ का अहंकार नहीं है और जिसकी बुद्धि सांसारिक विषयों में संलग्न नहीं होती, वह व्यक्ति वास्तव में कर्मों से प्रभावित नहीं होता।

**श्लोक की व्याख्या:**

1. **‘यस्य नाहङ्‍कृतो भावो’** – जिस व्यक्ति का अहंकार नहीं है, जिसका मन आत्म-निर्भरता और ‘मैं कर रहा हूँ’ जैसे विचारों से मुक्त है।

2. **‘बुद्धिर्यस्य न लिप्यते’** – जिसकी बुद्धि सांसारिक वस्त्रों, सुख-सुविधाओं या कर्मों में लिप्त नहीं होती। ऐसी व्यक्ति की बुद्धि स्थिर और शांत होती है, और वह बाहरी वस्तुओं के प्रति कोई आकर्षण या लगाव नहीं रखता।

3. **‘हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति’** – ऐसे व्यक्ति द्वारा भले ही इन लोकों (संसार) की हिंसा होती हो, लेकिन वास्तव में वह हिंसा नहीं होती।

4. **‘न हन्ति न निबध्यते’** – ऐसा व्यक्ति न तो किसी को मारता है और न ही पाप से बंधता है।

इस प्रकार, इस श्लोक में यह सिद्ध किया गया है कि सच्चे संन्यासी या योगी वह हैं जिनके मन में अहंकार और लगाव नहीं है। उनके द्वारा किए गए कर्म, भले ही बाहरी दृष्टि से हिंसा के रूप में देखे जाएँ, वास्तव में पाप या बंधन का कारण नहीं बनते। ऐसा व्यक्ति कर्म के वास्तविक स्वरूप को समझता है और उसका कर्म निष्काम, स्वार्थ रहित और संसार के हित में होता है। इस प्रकार, वह व्यक्ति कर्मफल से मुक्त रहता है और आत्मा की वास्तविक स्थिति को प्राप्त करता है।