अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि

भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 16

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संस्कृत श्लोक

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥

हिंदी अर्थ

परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि (सत्संग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, इसलिए जो उपर्युक्त साधनों से रहित है, उसकी बुद्धि अशुद्ध है, ऐसा समझना चाहिए।) होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता

सरल हिंदी व्याख्या

अध्याय 18, श्लोक 16 का यह श्लोक हमें सिखाता है कि जो व्यक्ति कर्मों के लिए केवल आत्मा को कर्ता मानता है, वह सच में वस्तुस्थिति को नहीं समझता। श्लोक का भावार्थ निम्नलिखित है:

जब कोई व्यक्ति अपनी अशुद्ध बुद्धि के कारण, जो कि सत्संग, शास्त्र के अध्ययन, और भगवदर्थ कर्म एवं उपासना से शुद्ध नहीं हुई है, केवल आत्मा को कर्ता मानता है, तो वह यथार्थ को सही से नहीं देख पाता। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि मलीन होती है और उसे वास्तविकता का ज्ञान नहीं होता।

इस श्लोक का संदेश यह है कि कर्म और उसके परिणामों के प्रति समझदारी और दृष्टिकोण सही होना चाहिए। केवल आत्मा को कर्ता मानकर कर्मों की जिम्मेदारी को आत्मा पर डाल देना, वास्तविक ज्ञान की कमी को दर्शाता है। इसे समझने के लिए व्यक्ति को अपनी बुद्धि को शुद्ध करने की आवश्यकता है, जो सही शास्त्र और साधना के माध्यम से संभव है।