अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव
भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
(आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन)
द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन
सरल हिंदी व्याख्या
हे अर्जुन! इस संसार में मनुष्यों के दो प्रमुख प्रकार होते हैं:
दैवी स्वभाव वाले - ये लोग उच्च आत्मा और नैतिकता के गुणों से परिपूर्ण होते हैं। आसुरी स्वभाव वाले - ये लोग अधर्म और आसुरी प्रवृत्तियों से प्रभावित होते हैं। भगवान कृष्ण यहाँ अर्जुन को समझा रहे हैं कि पहले दैवी स्वभाव वाले लोगों के लक्षण और उनके गुण विस्तार से बताए जा चुके हैं। अब वे आसुरी स्वभाव वाले लोगों की विशेषताओं और उनकी कुदृष्टि (अधोगति) को विस्तार से समझाएंगे।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान कृष्ण अर्जुन को सूचित कर रहे हैं कि एक व्यक्ति का स्वभाव और उसकी प्रवृत्तियाँ उसे ऊँचाई या नीचाई की ओर ले जाती हैं। दैवी स्वभाव से व्यक्ति उन्नति की ओर बढ़ता है, जबकि आसुरी स्वभाव से व्यक्ति पतन की ओर जाता है।
इस प्रकार, भगवान कृष्ण ने इस श्लोक में आसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों की विशेषताओं को जानने की आवश्यकता की ओर इशारा किया है, ताकि अर्जुन और अन्य लोग भी यह समझ सकें कि वे किन गुणों को अपनाएँ और किनसे बचें।