अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव
भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥
हिंदी अर्थ
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि दैवी और आसुरी सम्पदा की विशेषताएँ क्या होती हैं और वे किस प्रकार के प्रभाव डालती हैं।
दैवी सम्पदा: यह वह गुण और विशेषताएँ हैं जो मुक्ति की दिशा में ले जाती हैं, जैसे कि सत्य, अहिंसा, तपस्या, दया, और विनम्रता। ये गुण आत्मा को शुद्ध करते हैं और उसे ईश्वर की ओर ले जाते हैं।
आसुरी सम्पदा: इसके विपरीत, यह गुण और विशेषताएँ हैं जो बंधन और पतन की ओर ले जाती हैं, जैसे कि अहंकार, क्रोध, लालच, और झगड़ालू स्वभाव। ये गुण व्यक्ति को सांसारिक बंधनों में जकड़ते हैं और उसकी आत्मिक उन्नति में बाधा डालते हैं।
श्लोक के अंत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वे दैवी सम्पदा से परिपूर्ण हैं और इस प्रकार की गुणों को धारण करते हैं। इसलिए उन्हें किसी भी प्रकार के शोक की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे एक उच्च और पवित्र स्वभाव के व्यक्ति हैं। यह श्लोक अर्जुन को अपने वास्तविक स्वभाव की पहचान कराता है और उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।