अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव

भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 20

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संस्कृत श्लोक

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ घोर नरकों में पड़ते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

"आसुरीं योनिमापन्ना": आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति, जो अपने कर्मों और व्यवहार से असत्य, अधर्म और बुराई को अपनाते हैं, वे आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं। आसुरी योनि का तात्पर्य है उन अस्तित्वों से है जो नकारात्मक ऊर्जा, दुष्टता, और अहंकार से भरे होते हैं।

"मूढा जन्मनि जन्मनि": ये व्यक्ति बार-बार जन्म लेते हैं, लेकिन हर बार मूर्खता और अज्ञानता के कारण सही मार्ग पर नहीं चल पाते।

"मामप्राप्यैव कौन्तेय": ये लोग मुझे, अर्थात् भगवान को, प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं।

"ततो यान्त्यधमां गतिम्": इस असमर्थता और आसुरी स्वभाव के कारण, वे अंततः बहुत ही नीच अवस्था को प्राप्त होते हैं, यानी दुष्ट कर्मों और अधर्म के परिणामस्वरूप घोर नरकों में चले जाते हैं।

इस श्लोक का संदेश यह है कि आसुरी स्वभाव और कर्मों का परिणाम अत्यंत दुरात्मिक होता है। इससे बचने के लिए हमें सत्कर्म, धर्म और सत्य की ओर प्रवृत्त होना चाहिए।