अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव

भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 19

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

हिंदी अर्थ

उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

जो लोग द्वेषपूर्ण, पापाचारी और क्रूर होते हैं, वे नराधम हैं। वे लोग जो दूसरों को दुःख पहुंचाते हैं और पाप करते हैं, उन्हें भगवान बार-बार इस संसार में आसुरी योनियों में ही डालते हैं।

व्यास:

द्वेष करने वाले: जो लोग दूसरों के प्रति घृणा और द्वेष रखते हैं। इनकी प्रवृत्तियाँ और विचार नकारात्मक होते हैं, जो उन्हें कर्मों की दुष्परिणामों की ओर ले जाते हैं।

क्रूर: जो लोग अत्यंत निर्दयी और कठोर होते हैं, जिनके कर्म और स्वभाव दुष्ट होते हैं।

नराधम: जो लोग दीन-हीन और पतित होते हैं। ये वे लोग हैं जिनकी आदतें और कर्म निम्न स्तर के होते हैं।

संसार में आसुरी योनियों में डालना: भगवान यह संकेत कर रहे हैं कि दुष्ट और पापी लोगों को उनके कर्मों के अनुसार दुष्ट योनियों (जैसे की पिशाच, राक्षस आदि) में जन्म लेना पड़ता है, जहां उन्हें अपने कर्मों के फल भुगतने पड़ते हैं।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि पाप और क्रूरता का परिणाम बुरा होता है और ऐसे लोगों को हमेशा दुष्ट स्थितियों और योनियों का सामना करना पड़ता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि अपने कर्मों को सच्चे और नेक बनाए रखें, ताकि अच्छे फल प्राप्त कर सकें।