अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव
भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥
हिंदी अर्थ
वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जाएगा
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में एक व्यक्ति के आसुरी स्वभाव की छवि प्रस्तुत की गई है। यहाँ वह व्यक्ति इस सोच में है कि उसने अभी तक जो भी प्राप्त किया है, वह पर्याप्त है और अब वह अपने सभी इच्छाओं को पूरा कर लेगा। उसकी सोच है कि उसके पास वर्तमान में बहुत धन है और यह भी बढ़ जाएगा। यह व्यक्ति पूरी तरह से भौतिकता में मग्न है और भविष्य के बारे में उसके विचार केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर ही केन्द्रित हैं।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने उन लोगों की मानसिकता की आलोचना की है जो केवल भौतिक संपत्ति को ही सब कुछ मानते हैं और जीवन के उद्देश्य को केवल भौतिक साधनों तक सीमित कर देते हैं। ऐसे लोग यह मानते हैं कि केवल धन और ऐश्वर्य ही जीवन की पूर्णता का प्रमाण हैं, और वे इस बात को भूल जाते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य और संतोष केवल भौतिक संपत्ति से प्राप्त नहीं होता।
इसलिए, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि केवल भौतिक संपत्ति की ओर ध्यान केंद्रित करना और उसके माध्यम से ही संतोष की खोज करना एक सीमित दृष्टिकोण है। वास्तविक संतोष और खुशी केवल आध्यात्मिक उन्नति और नैतिक मूल्यों के अनुसरण से प्राप्त हो सकती है।