अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव
भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥
हिंदी अर्थ
वे आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में उन लोगों की स्थिति का वर्णन किया गया है जो आशा और इच्छाओं के सैकड़ों बंधनों में फंसे हुए हैं। ये लोग काम और क्रोध के पाश में बंधे रहते हैं, जो उन्हें हर समय अपनी इच्छाओं की पूर्ति की ओर उकसाता है। ऐसे लोग केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए निरंतर धन और अन्य संसाधनों का संग्रह करते रहते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अन्याय और भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़े।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आशा और इच्छाओं का असीम बंधन व्यक्ति को नैतिकता और धर्म के मार्ग से हटा सकता है। जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए हर सीमा पार कर जाता है और गलत तरीके अपनाता है, तो वह आसुरी स्वभाव का प्रतीक बन जाता है।
इससे यह भी संकेत मिलता है कि व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और केवल उचित और नैतिक मार्ग पर ही चलना चाहिए। यह श्लोक एक चेतावनी है कि अत्यधिक भौतिक इच्छाएँ और उनमें लिप्त रहना व्यक्ति के चरित्र को गिरा सकता है और समाज में असमानता और अन्याय को बढ़ावा दे सकता है।