अध्याय 16: दैवी तथा आसुरी स्वभाव

भगवद् गीता अध्याय 16, श्लोक 11

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संस्कृत श्लोक

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।

कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥

हिंदी अर्थ

तथा वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, विषयभोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और 'इतना ही सुख है' इस प्रकार मानने वाले होते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

यह श्लोक दैवी और आसुरी स्वभाव की पहचान के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। इसमें दैवी स्वभाव के विपरीत आसुरी स्वभाव के लक्षणों का वर्णन है।

"चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः": आसुरी स्वभाव वाले व्यक्ति असंख्य और अत्यधिक चिन्ताओं में उलझे रहते हैं। ये चिन्ताएँ कभी समाप्त नहीं होतीं और अंततः प्रलय (विनाश) के समय तक चलती रहती हैं। ऐसे व्यक्ति इस स्थिति को अपने जीवन का हिस्सा मान लेते हैं और इन्हीं चिंताओं को अपने जीवन की वास्तविकता मानते हैं।

"कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः": ये व्यक्ति अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य विषयभोग (संसारिक सुख और ऐशो-आराम) को मानते हैं। वे मानते हैं कि जीवन का यही सबसे बड़ा सुख है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वे सतत प्रयासरत रहते हैं। उनका यही विश्वास होता है कि यही सब कुछ है और इसके अलावा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है।

इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा रहा है कि आसुरी स्वभाव वाले लोग स्थायी सुख और शांति की खोज में नहीं होते; वे केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और सांसारिक इच्छाओं के पीछे भागते हैं, और इन सबके बीच वे अनंत चिंताओं और परेशानियों से घिरे रहते हैं। इस प्रकार, उनका जीवन निरंतर चिंताओं और असंतोष में लिप्त रहता है।