अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग

भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 18

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संस्कृत श्लोक

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥

हिंदी अर्थ

क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग- क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि वे केवल ‘क्षर’ (नाशवान) और ‘अक्षर’ (नाशातीत) से भी श्रेष्ठ हैं।

'क्षर' और 'अक्षर':

‘क्षर’ से तात्पर्य है जो नाशवान या परिवर्तनशील है, जैसे कि भौतिक शरीर और भौतिक वस्तुएं। ‘अक्षर’ से तात्पर्य है जो नाशातीत, अविनाशी है, जैसे कि आत्मा या परमात्मा। ‘अहम् अक्षरात् अपि च उत्तमः’:

भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि वे ‘अक्षर’ से भी श्रेष्ठ हैं। इसका मतलब यह है कि वे न केवल अविनाशी आत्मा के भी परे हैं, बल्कि वे स्वयं परमधाम और परम सत्य हैं। ‘अतोऽस्मि लोके वेडे च प्रथितः पुरुषोत्तमः’:

इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण यह घोषणा कर रहे हैं कि वे संसार और वेदों में ‘पुरुषोत्तम’ अर्थात् सर्वोत्तम पुरुष के रूप में प्रसिद्ध हैं। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वे न केवल भौतिक संसार की सीमाओं से परे हैं बल्कि आत्मा और परमात्मा के भी पार हैं। वे सम्पूर्ण सृष्टि के सबसे सर्वोच्च तत्व हैं।