अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण
भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥
हिंदी अर्थ
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश (अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता होती है, उसका नाम 'प्रकाश' है) को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह (निद्रा और आलस्य आदि की बहुलता से अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतन शक्ति के लय होने को यहाँ 'मोह' नाम से समझना चाहिए) को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है। (जो पुरुष एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अन्तःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहादि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं, यही उसके गुणों से अतीत होने के प्रधान लक्षण है)
सरल हिंदी व्याख्या
श्री भगवान अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के कार्यरूपों को इस प्रकार समझता है कि प्रकाश (सत्त्वगुण), प्रवृत्ति (रजोगुण) और मोह (तमोगुण) को वह न तो प्रवृत्त होने पर द्वेष करता है और न ही निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है, वह गुणातीत होता है।
यह श्लोक उन गुणातीत व्यक्तियों की विशेषता का वर्णन करता है जो त्रिगुणमयी माया से परे होकर परमात्मा में स्थित होते हैं। ऐसे व्यक्ति का अन्तःकरण कभी भी तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह की स्थिति पर न तो आकर्षित होता है और न ही इनमें कोई द्वेष करता है।
इस प्रकार, गुणातीत व्यक्ति का मन इन गुणों की स्थिति को लेकर किसी भी प्रकार की भावना या विकार से मुक्त रहता है। यह श्लोक हमें बताता है कि सच्चे योगी का मन इन तीनों गुणों के प्रभावों से अछूता रहता है और इस प्रकार वह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने में सक्षम होता है।