अध्याय 14: प्रकृति के तीन गुण

भगवद् गीता अध्याय 14, श्लोक 14

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संस्कृत श्लोक

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌।

तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥

हिंदी अर्थ

जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि जब किसी जीवात्मा का शरीर सत्त्वगुण की वृद्धि के साथ मृत्यु को प्राप्त होता है, तो वह उस अवस्था में होता है जहाँ सत्त्वगुण (ज्ञान, पवित्रता, और सत्यता) अत्यधिक मात्रा में प्रबल होता है। इस प्रकार के व्यक्ति को उत्तम कर्म करने वालों के लिए निर्दिष्ट, निर्मल और दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है। ये लोक जैसे कि स्वर्ग आदि, अत्यंत शुद्ध और पवित्र होते हैं, जहाँ आत्मा को उच्चतर आध्यात्मिक सुख और शांति का अनुभव होता है।

मुख्य बिंदु:

सत्त्वगुण की वृद्धि: सत्त्वगुण का अर्थ है पवित्रता, ज्ञान, और शांति। जब यह गुण किसी व्यक्ति में प्रबल हो जाता है, तो वह व्यक्ति अच्छे और धर्मपरायण कर्म करता है। प्रलय (मृत्यु): जब ऐसे व्यक्ति की मृत्यु होती है, जिसमें सत्त्वगुण की वृद्धि हो चुकी होती है। उत्तम लोकों की प्राप्ति: सत्त्वगुणी व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात श्रेष्ठ, निर्मल, और दिव्य लोकों की प्राप्ति होती है, जहाँ वह आत्मा शांति और सुख का अनुभव करती है। इस प्रकार, यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि सत्त्वगुण की वृद्धि से हमारे कर्म शुद्ध और अच्छे होते हैं, जो हमें मृत्यु के बाद भी सुखद अनुभव प्रदान करते हैं। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सत्त्वगुण को बढ़ाने का प्रयास करें।