अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
असक्तिरनभिष्वङ्ग: पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥
हिंदी अर्थ
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता का न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य के जीवन में वैराग्य और समत्व की महत्ता को समझाया है। यहाँ दो मुख्य गुणों पर जोर दिया गया है:
असक्ति : मनुष्य जीवन में अपने पुत्र, पत्नी, घर, धन आदि के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है। लेकिन भगवान कहते हैं कि असली आध्यात्मिकता तब प्रकट होती है जब व्यक्ति इनसे आसक्ति नहीं रखता। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें अपने कर्तव्यों को त्याग देना चाहिए, बल्कि यह है कि हमें इन्हें ममता और मोह के साथ नहीं निभाना चाहिए।
यदि हम इन संबंधों और भौतिक वस्तुओं से आसक्त हो जाते हैं, तो हमारा मन और चित्त उनमें उलझकर रह जाता है, जिससे हम अपने आध्यात्मिक पथ से भटक सकते हैं। इसलिए, अपने कर्तव्यों को निभाते हुए, हमें अपने मन को इनसे मुक्त रखना चाहिए।
समचित्त: जीवन में प्रिय और अप्रिय, सुख और दुःख, लाभ और हानि, ये सब परिस्थितियाँ आती-जाती रहती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सच्चा योगी वही है जिसका चित्त हर स्थिति में सम रहता है।
जब हमें कोई प्रिय वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति प्राप्त होती है, तो हमारा मन प्रसन्न होता है, और जब हमें कोई अप्रिय अनुभव होता है, तो हम दुखी होते हैं। लेकिन भगवद्गीता सिखाती है कि हमें अपने मन को इस द्वंद्व से ऊपर उठाना चाहिए और इन दोनों अवस्थाओं में समान भाव रखना चाहिए।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि कैसे एक साधक को अपने जीवन में संतुलन और निर्लिप्तता का अभ्यास करना चाहिए। आसक्ति का त्याग और समचित्तता का पालन ही हमें सच्ची शांति और आत्मज्ञान की ओर ले जा सकते हैं।