अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 8

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संस्कृत श्लोक

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌॥

हिंदी अर्थ

इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान के कुछ महत्वपूर्ण तत्वों का वर्णन किया है।

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् का अर्थ है इंद्रियों के विषयों में वैराग्य या उनमें आसक्ति का अभाव। अर्थात्, संसार के भोगों के प्रति निष्काम भाव रखना। इंद्रियां हमारे शरीर के वे उपकरण हैं जो बाहरी संसार से जुड़ने का माध्यम बनती हैं। जब व्यक्ति इन इंद्रियों के सुख और दुख से प्रभावित हुए बिना, उनसे मुक्ति पाने का प्रयास करता है, तो वह सच्चे ज्ञान की ओर बढ़ता है।

अनहंकार एव च का अर्थ है अहंकार का अभाव। अहंकार वह भावना है जिसमें व्यक्ति स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानता है, और अपने अस्तित्व को दूसरों से अलग समझता है। इस श्लोक में अहंकार को त्यागने की बात की गई है, क्योंकि यह आध्यात्मिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् का अर्थ है जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग के दुखों और दोषों का बार-बार विचार करना। संसार में जन्म लेने से मृत्यु तक जो विभिन्न अवस्थाएं होती हैं, उनमें दुखों का अनुभव करना स्वाभाविक है। इन दुखों का बार-बार विचार करने से व्यक्ति संसार के मोह से विमुक्त हो सकता है और परम सत्य की खोज में आगे बढ़ सकता है।

संक्षेप में: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने संसार के भोगों से विमुख होने, अहंकार का त्याग करने, और जीवन के अनिवार्य दुखों पर चिंतन करने को सच्चे ज्ञान की पहचान बताया है। जब व्यक्ति इन गुणों को धारण करता है, तो वह आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रगति करता है।