अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥
हिंदी अर्थ
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना (शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति।) और धृति (गीता अध्याय 18 श्लोक 34 व 35 तक देखना चाहिए।)-- इस प्रकार विकारों (पाँचवें श्लोक में कहा हुआ तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए।) के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया
सरल हिंदी व्याख्या
श्री कृष्ण इस श्लोक में 'क्षेत्र' अर्थात शरीर और उससे जुड़े तत्वों के बारे में विस्तार से बताते हैं। यहाँ वह 'क्षेत्र' के विभिन्न विकारों को संक्षेप में बताते हैं, जो इस प्रकार हैं:
इच्छा (Desire): यह व्यक्ति की किसी वस्तु, परिस्थिति या अनुभव की प्राप्ति की इच्छा को दर्शाता है। यह मानवीय स्वभाव का एक महत्वपूर्ण अंग है और इसे क्षेत्र का विकार कहा गया है।
द्वेष (Aversion): यह किसी वस्तु, परिस्थिति या व्यक्ति से नापसंदगी या नफरत को दर्शाता है। द्वेष भी क्षेत्र का एक विकार है जो हमें अशांति की ओर ले जाता है।
सुख (Pleasure): सुख का अनुभव तब होता है जब व्यक्ति को किसी इच्छा की पूर्ति होती है। यह एक सकारात्मक अनुभूति है, लेकिन इसे भी क्षेत्र का विकार माना गया है, क्योंकि यह व्यक्ति को स्थायी संतोष नहीं देता।
दुःख (Pain): दुःख का अनुभव तब होता है जब किसी इच्छा की पूर्ति नहीं होती या किसी प्रकार का हानि होती है। यह भी क्षेत्र का एक विकार है, जो व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक पीड़ा की ओर ले जाता है।
सङ्घात (Body): शरीर या स्थूल देह का पिण्ड, जिसमें पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का संयोजन होता है, इसे क्षेत्र का विकार कहा गया है।
चेतना (Consciousness): यह शरीर और मन के बीच की चेतना शक्ति है, जो जीवन के सभी अनुभवों को संभव बनाती है। यह भी क्षेत्र का एक अंग है।
धृति (Fortitude): धृति का अर्थ है धैर्य या स्थिरता, जो व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में संतुलित रखती है। इसे भी क्षेत्र का एक विकार कहा गया है।
संक्षेप में: इस श्लोक में श्री कृष्ण ने शरीर (क्षेत्र) के विभिन्न विकारों का वर्णन किया है। ये विकार (इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि) मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं और इसे माया के बंधनों में जकड़े रखते हैं। इन विकारों से मुक्त होने पर ही मनुष्य मोक्ष या परम शांति प्राप्त कर सकता है। श्री कृष्ण यहाँ यह समझा रहे हैं कि ये सभी विकार क्षेत्र (शरीर और मन) का हिस्सा हैं और इन्हें समझकर ही हम आत्मा के सत्य स्वरूप को जान सकते हैं।