अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥
हिंदी अर्थ
इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है (दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको 'तत्व से जानना' है) वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने यह समझाने का प्रयास किया है कि जिस व्यक्ति ने पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (माया) को सही अर्थ में समझ लिया है, वह किस प्रकार जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
तत्वज्ञान:
जो व्यक्ति पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (माया) के गुणों को समग्रता में जानता है, वह समझता है कि: माया (प्रकृति) की सम्पूर्ण रचना केवल क्षणिक, नाशवान, जड़ और अनित्य है। जीवात्मा (आत्मा) नित्य, चेतन, निर्विकार, और अविनाशी है। परमात्मा (ईश्वर) शुद्ध, बोधस्वरूप, और सच्चिदानन्दघन है, जो कि जीवात्मा का सनातन अंश है। त्याग और एकता:
जब व्यक्ति इस प्रकार के तत्वज्ञान के साथ सम्पूर्ण मायिक पदार्थों को त्यागकर परमात्मा में एकीभाव से स्थित होता है, तो वह सच्चे अर्थ में ज्ञान प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति सर्वथा वर्तमान (हर स्थिति और समय में) कर्म करते हुए भी, जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। सार: यह श्लोक यह सिखाता है कि ज्ञान की प्राप्ति से, और सही तरीके से प्रकृति और पुरुष की पहचान कर, एक व्यक्ति कर्म करने के बावजूद पुनर्जन्म से मुक्त हो सकता है। इस प्रकार, सच्चे ज्ञान के द्वारा ही आत्मा को शाश्वत शांति प्राप्त होती है।