अध्याय 11: विराट रूप
भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास॥
हिंदी अर्थ
मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए
सरल हिंदी व्याख्या
अर्जुन के विराट रूप के दर्शन से प्रभावित हो कर, वह अत्यंत हर्षित और विस्मित है। यह अद्भुत दृश्य उसके लिए पूरी तरह नया और अनदेखा है, जो उसे अत्यधिक आनंदित करता है। लेकिन विराट रूप की भव्यता और विराटता से उत्पन्न भय और असहजता के कारण उसका मन व्याकुल हो गया है।
अर्जुन इस स्थिति में भगवान से प्रार्थना करता है कि वह अपने विराट रूप को त्याग कर अपने सामान्य और मानवीय रूप में प्रकट हों। उसकी यह प्रार्थना इस बात का संकेत है कि वह भगवान की वास्तविकता और सौम्यता को अपने लिए अधिक स्वीकार्य मानता है, जिससे कि वह शांतिपूर्वक युद्ध की स्थिति को समझ सके।
अर्जुन की यह भावनाएँ हमें यह भी सिखाती हैं कि दिव्य और अलौकिक रूप के दर्शन से व्यक्ति को शांति और संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है, और वास्तविकता के प्रति उसकी अपेक्षाएँ सरल और साधारण हो सकती हैं।