अध्याय 11: विराट रूप
भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥
हिंदी अर्थ
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विराट रूप को देखकर उत्पन्न भय और बेचैनी को व्यक्त कर रहे हैं। भगवान के विशाल और भयानक रूप को देखकर अर्जुन के मन में एक प्रकार का आतंक छा जाता है। वह इस रूप को देखकर दिशाओं का ज्ञान खो बैठते हैं, यानी वे सोचने और समझने की शक्ति खो देते हैं। इस विराट रूप के मुखों में अर्जुन को काल के समान विनाशकारी अग्नि दिखाई देती है, जो जीवों का संहार करने के लिए तत्पर है।
इस स्थिति में अर्जुन भगवान से निवेदन करते हैं कि वे कृपा करके अपने इस रूप को सामान्य करें, ताकि उन्हें शांति मिल सके। यह श्लोक अर्जुन के भीतर के भय और भगवान की अपार शक्ति के प्रति उनकी श्रद्धा को दर्शाता है। अर्जुन समझते हैं कि भगवान ही सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार के अधिकारी हैं और उनके विराट रूप में यह सभी शक्तियाँ समाहित हैं।
इस श्लोक से हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि संसार में किसी भी शक्ति का अंत भगवान के हाथों में है और वही सृष्टि के कर्ता-धर्ता हैं। उनका आश्रय प्राप्त करने से ही व्यक्ति को सच्ची शांति और मुक्ति मिल सकती है।