अध्याय 11: विराट रूप
भगवद् गीता अध्याय 11, श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥
हिंदी अर्थ
हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में, अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का वर्णन कर रहे हैं। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया, तब अर्जुन ने उस रूप में भगवान को चारों ओर से अनंत और असीमित रूपों में देखा। इस विराट रूप में भगवान के अनगिनत भुजाएँ, मुख, और नेत्र थे, जो उनके व्यापक और सर्वशक्तिमान स्वरूप को दर्शाते हैं।
अर्जुन ने महसूस किया कि इस विराट रूप का कोई अंत, मध्य या आदि नहीं है। इसका मतलब यह है कि भगवान का रूप असीमित और अनंत है, जिसकी कोई सीमा नहीं है। भगवान सर्वत्र विद्यमान हैं और उनकी महिमा, शक्ति और उपस्थिति की कोई सीमा नहीं है।
यह श्लोक दर्शाता है कि भगवान का रूप हमारी कल्पना और समझ से परे है। वह अनंत हैं, और उनकी महानता की कोई सीमा नहीं है। अर्जुन के लिए, भगवान का यह विराट रूप अद्भुत और अद्वितीय अनुभव था, जो उन्हें भगवान की असली महिमा और शक्ति का अहसास कराता है।