अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य
भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
हिंदी अर्थ
निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के गुण और उनके आपसी संबंध को वर्णित कर रहे हैं।
"मच्चित्ता मद्गतप्राणा": यह दर्शाता है कि जो भक्त मेरे ध्यान में पूरी तरह से लीन हैं और जिनका मन और प्राण मेरे में समाहित हैं, वे मेरे प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।
"बोधयन्तः परस्परम्": ऐसे भक्त एक-दूसरे को मेरी कथाओं और गुणों के बारे में ज्ञान प्रदान करते हैं, और आपसी संवाद के माध्यम से एक-दूसरे को प्रेरित करते हैं।
"कथयन्तश्च मां नित्यं": ये भक्त प्रतिदिन मेरे विषय में चर्चा करते हैं, मेरी लीला और गुणों का गुणगान करते हैं, जिससे उनका आत्मिक जीवन संपूर्ण होता है।
"तुष्यन्ति च रमन्ति च": इस प्रकार, वे आत्मिक संतोष और आनंद प्राप्त करते हैं। इस दिव्य चर्चा और श्रद्धा से उनके जीवन में खुशी और आनंद का अनुभव होता है।
व्याख्या :
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि जो भक्त उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होते हैं और उनके गुणों की चर्चा करते हैं, वे सच्चे आनंद और संतोष की प्राप्ति करते हैं। ऐसे भक्त एक-दूसरे के साथ भगवान की भक्ति और ज्ञान साझा करके आपसी संबंधों को भी प्रगाढ़ बनाते हैं। यह भक्ति केवल व्यक्तिगत संतोष तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह एक सामूहिक और साझा अनुभव बन जाती है। इस प्रकार, भगवान के प्रति समर्पण और उनकी कथा का आदान-प्रदान भक्तों के जीवन में एक दिव्य आनंद और संतोष लाता है।