अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य

भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 10

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संस्कृत श्लोक

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌।

ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

हिंदी अर्थ

उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

भगवान श्री कृष्ण यहाँ भक्तों की भक्ति की महत्ता को उजागर कर रहे हैं। वह बता रहे हैं कि जो व्यक्ति नियमित रूप से और प्रेमपूर्वक उनकी आराधना करता है, उसके दिल और आत्मा में भगवान की उपस्थिति का ज्ञान प्रकट होता है।

सततयुक्तानां - इसका मतलब है कि जो लोग लगातार और नियमित रूप से भक्ति में लगे रहते हैं। यह सततता भक्ति के प्रति एक दृढ़ संकल्प को दर्शाती है, जो भगवान के साथ एक स्थिर और सच्चा संबंध बनाने में सहायक होती है।

भजतां प्रीतिपूर्वकम् - इसका अर्थ है कि भक्ति करते समय यदि व्यक्ति प्रेम और श्रद्धा के साथ भगवान की सेवा करता है, तो उसकी भक्ति सच्ची होती है। यह प्रेमपूर्ण भक्ति ही भगवान को प्रसन्न करती है और भक्त को दिव्य ज्ञान का मार्ग दिखाती है।

ददामि बुद्धियोगं - यहाँ भगवान कहते हैं कि वे अपने भक्तों को 'बुद्धियोग' प्रदान करते हैं। 'बुद्धियोग' से तात्पर्य है आत्मज्ञान या दिव्य ज्ञान जो भक्त को भगवान के सच्चे स्वरूप को समझने में मदद करता है।

येना मामुपयान्ति ते - इसका अर्थ है कि इस ज्ञान के माध्यम से भक्त भगवान की पूर्णता को समझ सकते हैं और अंततः भगवान तक पहुँच सकते हैं।

इस प्रकार, भगवान श्री कृष्ण ने इस श्लोक में यह स्पष्ट किया है कि भक्ति और प्रेमपूर्वक आराधना करने वाले भक्तों को भगवान विशेष ज्ञान प्रदान करते हैं, जो उन्हें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति और भगवान के समीप जाने में सहायता करता है।