अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य

भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 17

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संस्कृत श्लोक

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥

हिंदी अर्थ

हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं?

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि वे कैसे और किन भावनाओं में उन्हें हमेशा चिंतन और ध्यान कर सकते हैं। अर्जुन का यह प्रश्न उनकी जिज्ञासा और श्रद्धा को दर्शाता है, जिसमें वे जानना चाहते हैं कि भगवान की विभूतियों (ऐश्वर्य, महिमा) का चिंतन कैसे किया जाए ताकि वे उनके साक्षात दर्शन कर सकें और आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त कर सकें।

यह प्रश्न यह भी दर्शाता है कि अर्जुन जानना चाहते हैं कि भगवान किस रूप में और किस भाव में सर्वत्र व्याप्त हैं, ताकि वह उनके निरंतर चिंतन और स्मरण में लीन रह सकें। अर्जुन की यह जिज्ञासा दर्शाती है कि एक भक्त के मन में किस प्रकार की स्थिति होनी चाहिए जब वह भगवान का ध्यान करना चाहता है।

इस श्लोक के माध्यम से, अर्जुन ने सामान्य मानव की ओर से भगवान से यह पूछा है कि जब हम भगवान का ध्यान करते हैं, तो हमें किन रूपों में और किन भावों में भगवान का स्मरण करना चाहिए। यह भगवान के प्रति समर्पण, भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सारांश:

अर्जुन भगवान से यह जानना चाहते हैं कि भगवान किस-किस रूप में और किन भावनाओं में व्याप्त हैं ताकि वे भगवान का समर्पण भाव से ध्यान कर सकें। यह श्लोक भक्ति योग और ध्यान के मार्ग में मार्गदर्शन के लिए महत्वपूर्ण है।