NI Act धारा 148: दोषसिद्ध के विरुद्ध अपील के लंबित रहते संदाय का आदेश करने की अपील न्यायालय की शक्ति
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 · अध्याय 17: खातों में अपर्याप्त निधियों के कारण कतिपय चेकों के अनादरण की दशा में शास्तियां
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¶[148. दोषसिद्ध के विरुद्ध अपील के लंबित रहते संदाय का आदेश करने की अपील न्यायालय की शक्ति—(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, धारा 138 के अधीन दोषसिद्धि के विरुद्ध लेखीवाल द्वारा की गई किसी अपील में अपील न्यायालय, अपीलार्थी को ऐसी राशि जमा कराने का आदेश कर सकेगा, जो विचारण न्यायालय द्वारा अधिनिर्णीत जुर्माना या प्रतिकर का न्यूनतम बीस प्रतिशत होगी :
¶परंतु इस धारा के अधीन संदेय रकम, धारा 143क के अधीन अपीलार्थी द्वारा संदत्त किसी भी अंतरिम प्रतिकर के अतिरिक्त होगी ।
¶(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट रकम, आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर या अपीलार्थी द्वारा पर्याप्त कारण दर्शित किए जाने पर तीस दिन से अनधिक की ऐसी और अवधि के भीतर, जिसका न्यायालय द्वारा निदेश दिया जाए, जमा कराई जाएगी ।
¶(3) अपील न्यायालय, अपील के लंबित रहने के दौरान किसी भी समय अपीलार्थी द्वारा जमा की गई रकम को परिवादी को देने का निदेश दे सकेगा :
¶परंतु यदि अपीलार्थी दोषमुक्त कर दिया जाता है, तो न्यायालय, परिवादी को, आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर या परिवादी द्वारा पर्याप्त कारण दर्शित किए जाने पर तीस दिन से अनधिक की ऐसी और अवधि के भीतर, जिसका न्यायालय द्वारा निदेश दिया जाए, सुसंगत वित्तीय वर्ष के प्रारंभ पर प्रचलित भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा यथा प्रकाशित बैंक दर पर ब्याज सहित इस प्रकार दी गई रकम का अपीलार्थी को प्रतिसंदाय करने का निदेश देगा ।]
आधिकारिक संदर्भ: India Code, भारत सरकार — आधिकारिक हिंदी PDF — स्रोत समीक्षा: 5 अक्टूबर 2026.दर्ज संस्करण / स्नैपशॉट की तारीख: 2026-10-05.आधिकारिक हिंदी PDF से Banaka का संदर्भ प्रतिलेख; प्रमाणित या अलग दिनांकित समेकित संस्करण नहीं। PDF के खराब कॉपी-पेस्ट अक्षर-मानचित्र को उसके फ़ॉन्ट और अक्षर-संयोजन से पुनर्प्राप्त किया गया है। पंक्ति-विन्यास, पादटिप्पणी संकेत और अलग संशोधन टिप्पणियाँ हटाई गई हैं; मूल शब्द, उदाहरण और प्रावधान सुरक्षित हैं। PDF के स्रोत-वर्तनी और विराम-चिह्न अनियमितताएँ बनी हैं। समीक्षा की तारीख संस्करण की तारीख नहीं है। धारा 2 और ऐतिहासिक अनुसूची निरसित हैं। मूल PDF और लागू न्यायिक व्याख्या साथ पढ़ें।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें
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इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 138. खातों में अपर्याप्त निधियों, आदि के कारण चेक का अनादरण
- 139. धारक के पक्ष में उपधारणा
- 140. प्रतिरक्षा, जो धारा 138 के अधीन किसी अभियोजन में अनुज्ञात नहीं की जा सकेगी
- 141. कंपनियों द्वारा अपराध
- 142. अपराधों का संज्ञान
- 142A. लंबित मामलों के अंतरण का विधिमान्यकरण
- 143. न्यायालय की मामलों का संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति
- 143A. अंतरिम प्रतिकर का निदेश देने की शक्ति
- 144. समनों की तामील करने की रीति
- 145. शपथपत्र पर साक्ष्य
- 146. बैंक की पर्ची का कतिपय तथ्यों के लिए प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होना
- 147. अपराध का शमनीय होना