NI Act धारा 143: न्यायालय की मामलों का संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 · अध्याय 17: खातों में अपर्याप्त निधियों के कारण कतिपय चेकों के अनादरण की दशा में शास्तियां
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¶[143. न्यायालय की मामलों का संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति—(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अध्याय के अधीन सभी अपराधों का विचारण प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा और उक्त संहिता की धारा 262 से धारा 265 के उपबंध (दोनों धाराओं को सम्मिलित करते हुए), जहां तक हो सके, ऐसे विचारणों को लागू होंगे :
¶परंतु इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में किसी दोषसिद्धि की दशा में, मजिस्ट्रेट के लिए ऐसे कारावास का, जिसकी अवधि एक वर्ष से अधिक नहीं होगी और ऐसे जुर्माने का जिसकी रकम पांच हजार रुपए से अधिक नहीं होगी, दंडादेश पारित करना विधिपूर्ण होगा :
¶परंतु यह और कि इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के प्रारंभ पर या उसके दौरान जब मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि मामले की प्रकृति ऐसी है कि एक वर्ष से अधिक अवधि के कारावास का दंडादेश पारित किया जा सकता है या यह कि किसी अन्य कारण से, मामले का संक्षिप्त रूप में विचारण किया जाना अवांछनीय है तो मजिस्ट्रेट पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, उस आशय का आदेश अभिलिखित करेगा और तत्पश्चात् ऐसे किसी साक्षी को वापस बुलाएगा जिसकी परीक्षा की जा चुकी है और उक्त संहिता में उपबंधित रीति से मामले को सुनने या पुन: सुनने के लिए अग्रसर होगा ।
¶(2) इस धारा के अधीन किसी मामले का विचारण, यथासाध्य, अविरोध न्याय के हित में उसके समापन तक दिन प्रतिदिन जारी रखा जाएगा । जब तक कि न्यायालय लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से विचारण का अगले दिन से परे के लिए स्थगित किया जाना आवश्यक नहीं समझता है ।
¶(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक विचारण यथासंभव शीघ्रता से संचालित किया जाएगा और विचारण को परिवाद फाइल करने की तारीख से छह मास के भीतर समाप्त करने का प्रयास किया जाएगा ।
आधिकारिक संदर्भ: India Code, भारत सरकार — आधिकारिक हिंदी PDF — स्रोत समीक्षा: 5 अक्टूबर 2026.दर्ज संस्करण / स्नैपशॉट की तारीख: 2026-10-05.आधिकारिक हिंदी PDF से Banaka का संदर्भ प्रतिलेख; प्रमाणित या अलग दिनांकित समेकित संस्करण नहीं। PDF के खराब कॉपी-पेस्ट अक्षर-मानचित्र को उसके फ़ॉन्ट और अक्षर-संयोजन से पुनर्प्राप्त किया गया है। पंक्ति-विन्यास, पादटिप्पणी संकेत और अलग संशोधन टिप्पणियाँ हटाई गई हैं; मूल शब्द, उदाहरण और प्रावधान सुरक्षित हैं। PDF के स्रोत-वर्तनी और विराम-चिह्न अनियमितताएँ बनी हैं। समीक्षा की तारीख संस्करण की तारीख नहीं है। धारा 2 और ऐतिहासिक अनुसूची निरसित हैं। मूल PDF और लागू न्यायिक व्याख्या साथ पढ़ें।मूल अनुसूची और संशोधन टिप्पणियाँ देखें
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इस अध्याय की अन्य धाराएँ
- 138. खातों में अपर्याप्त निधियों, आदि के कारण चेक का अनादरण
- 139. धारक के पक्ष में उपधारणा
- 140. प्रतिरक्षा, जो धारा 138 के अधीन किसी अभियोजन में अनुज्ञात नहीं की जा सकेगी
- 141. कंपनियों द्वारा अपराध
- 142. अपराधों का संज्ञान
- 142A. लंबित मामलों के अंतरण का विधिमान्यकरण
- 143A. अंतरिम प्रतिकर का निदेश देने की शक्ति
- 144. समनों की तामील करने की रीति
- 145. शपथपत्र पर साक्ष्य
- 146. बैंक की पर्ची का कतिपय तथ्यों के लिए प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होना
- 147. अपराध का शमनीय होना
- 148. दोषसिद्ध के विरुद्ध अपील के लंबित रहते संदाय का आदेश करने की अपील न्यायालय की शक्ति