BNS अध्याय 3: साधारण अपवाद

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  1. धारा 14. विधि द्वारा आबद्ध या तथ्य की भूल के कारण अपने आप को विधि द्वारा आबद्ध होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
  2. धारा 15. न्यायिकत: कार्य करने हेतु न्यायाधीश का कार्य
  3. धारा 16. न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण मैं किया गया कार्य
  4. धारा 17. विधि द्वारा न्यायानुमत या तथ्य की भूल से अपने को विधि द्वारा न्‍यायानुमत होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
  5. धारा 18. विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना
  6. धारा 19. कार्य, जिससे अपहानि कारित होना संभाव्य है, किंतु जो आपराधिक आशय के बिना और अन्य अपहानि के निवारण के लिए किया गया है
  7. धारा 20. सात वर्ष से कम आयु के बालक का कार्य
  8. धारा 21. सात वर्ष से ऊपर, किंतु बारह वर्ष से कम आयु के अपरिपक्व समझ के बालक का कार्य
  9. धारा 22. विकृत् चित्त वाले व्यक्ति का कार्य
  10. धारा 23. ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरुद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय पर पहुंचने में असमर्थ है
  11. धारा 24. किसी व्यक्ति द्वारा, जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय या ज्ञान का होना अपेक्षित है
  12. धारा 25. सम्मति से किया गया कार्य जिससे मृत्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय न हो और न उसकी संभाव्यता का ज्ञान हो
  13. धारा 26. किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्मति से सद्भावपूर्वक किया गया कार्य, जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है
  14. धारा 27. संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से बालक या विकृत्त चित्त वाले व्यक्ति के फायदे के लिए सदझावपूर्वक किया गया कार्य
  15. धारा 28. सम्मति, जिसके संबंध में यह ज्ञात हो कि वह भय या भ्रम के अधीन दी गई है
  16. धारा 29. ऐसे कार्यों का अपवर्जन जो कारित अपहानि के बिना भी स्वत: अपराध है
  17. धारा 30. सम्मति के बिना किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक किया गया कार्य
  18. धारा 31. सद्भावपूर्वक दी गई संसूचना
  19. धारा 32. वह कार्य जिसको करने के लिए कोई व्यक्ति धमकियों द्वारा विवश किया गया है
  20. धारा 33. तुच्छ अपहानि कारित करने वाला कार्य
  21. धारा 34. प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई बातें
  22. धारा 35. शरीर तथा संपत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार
  23. धारा 36. ऐसे व्यक्ति के कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार, जो विकृत्त चित्त व्यक्ति हो
  24. धारा 37. कार्य, जिनके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है
  25. धारा 38. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब होता है
  26. धारा 39. कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का होता है
  27. धारा 40. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बना रहना
  28. धारा 41. कब संपति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक का होता है
  29. धारा 42. ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्‍न कोई अपहानि कारित करने तक का कब होता है
  30. धारा 43. सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बना रहना
  31. धारा 44. घातक हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जबकि निर्दोष व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है