अध्याय 8: भगवत्प्राप्ति

भगवद् गीता अध्याय 8, श्लोक 14

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संस्कृत श्लोक

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ, निरंतर मेरे ध्यान में लगा रहता है, वह मेरे लिए बहुत सुलभ है। यहाँ 'अनन्यचेताः' का तात्पर्य है कि जो भक्त पूरी तरह से मेरे प्रति समर्पित और निरंतर मेरे ध्यान में रहता है, वह 'सततं' यानी निरंतर मेरा स्मरण करता है।

भगवान कृष्ण यह भी बताते हैं कि ऐसा व्यक्ति जो 'नित्ययुक्तस्य' यानी हर समय योगी होता है, उसके लिए मैं बहुत सुलभ और सुलभ हूँ। यहाँ पर 'योगिनः' का मतलब है वह व्यक्ति जो योग के मार्ग पर चलता है और समर्पण और ध्यान के माध्यम से भगवान के साथ एकात्मता स्थापित करता है।

इस प्रकार, भगवान कृष्ण इस श्लोक में यह स्पष्ट करते हैं कि पूर्ण समर्पण और निरंतर ध्यान से भगवान की प्राप्ति सहज और सुलभ हो जाती है।