अध्याय 6: ध्यानयोग
भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
हिंदी अर्थ
ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में यह वर्णित किया गया है कि एक योगी को किस प्रकार की मानसिक स्थिति में होना चाहिए। योगी का मन शांत और भयमुक्त होना चाहिए। वह ब्रह्मचर्य (संयम) का पालन करते हुए आत्मा की शांति की स्थिति में होना चाहिए। ध्यान करते समय, योगी को अपने मन को पूरी तरह से संयमित करना चाहिए और उसे भगवान (या ध्यान के उद्देश्य) पर केंद्रित रखना चाहिए। इस अवस्था में, वह पूर्ण समर्पण और एकाग्रता के साथ ध्यान की स्थिति में बैठा होता है। इस प्रकार की स्थिति से ही योगी को आत्मज्ञान और ध्यान की सफलता प्राप्त होती है।